Maurya Empire Important topic

                                  Maurya Empire

                                     मौर्य साम्राज्य

 

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के लिए हमारे पास साहित्यिक, पुरातात्विक और विदेशी तीनो प्रकार के स्त्रोत उपलब्ध है ।

साहित्यिक स्त्रोत 

ब्राह्मण साहित्य पुराण, कोटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त की मुद्राराक्षस, सोमदेव की कथासरित्सागर, पतंजलि की महाभाष्य इत्यादि से मौर्य काल के बारे में जानकारी मिलती है । इनमे सर्वाधिक महत्वपूर्ण अर्थशास्त्र है, जो मौर्य प्रशासन पर प्रकाश डालता है । अर्थशास्त्र राजनीतिशास्त्र का ग्रन्थ है । अर्थशास्त्र पर टीका प्रबंध चिंतामणि है जिसकी रचना मेरुतुन्गाचार्य द्वारा की गयी है ।

बौद्धिक साहित्यों में दीपवंश अशोक के बौद्ध धर्म को श्रीलंका तक फैलाने की भूमिका के बारे में बताते है । अन्य बौद्ध साहित्य महावंश, दिव्यावदान तथा जैन साहित्य कल्पसूत्र आदि से भी मौर्य साम्राज्य के विस्तार पर प्रकाश पड़ता है ।

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पुरातात्विक साहित्य

पुरातात्विक साक्ष्यो में अशोक के अभिलेख अत्यधिक महत्वपूर्ण है । इन अभिलेखों से हमे अशोक के शासनकाल की समस्त जानकारी मिलती है ।

रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से मौर्यकालीन सिचाई व्यवस्था का पता चलता है । पहली बार इसी अभिलेख में चन्द्रगुप्त के लिए मौर्य शब्द का उल्लेख हुआ है ।

मौर्यकालीन स्थलों की खुदाई से प्राप्त मृदभांड, चांदी तथा तांबे के पंचमार्क (आहात मुद्राये) से भी मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है ।

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विदेशी विवरण

मेगस्थनीज की इंडिका से हमें मौर्य काल के प्रशासन, समाज और संस्कृति की जानकारी मिलती है ।

स्ट्राबो, कर्तियस, डिओडोरस, प्लिनी, अरियन जस्टिन, निर्याकस तथा एरिस्टोबुलस आदि यूनानी लेखको के विवरण से मौर्यकालीन इतिहास पर प्रकाश डालते है ।

फाह्यान और ह्व़ेन्सांग के ग्रंथो में भी मौर्यकालीन इतिहास की झलक देखने को मिलती है ।

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चन्द्रगुप्त मौर्य

मौर्य राजवंश की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने की थी । ब्राह्मण साहित्य में चन्द्रगुप्त मौर्य को शुद्र, बौद्ध एवं जैन ग्रंथो में क्षत्रिय तथा विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में वृषल (निम्न कुल का) बताया गया है । भारत का प्रथम साम्राज्य निर्माता चन्द्रगुप्त मौर्य था । इसने सर्वप्रथम पंजाब और सिंध को विदेशी दासता से मुक्त कराया । उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त में उसने यूनानी गवर्नर फिलिप द्रितीय को हराया था ।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से नन्द वंश के अंतिम राजा धनानंद को हराकर मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया और 322 ई. पू. में मगध के राजसिंहासन पर बैठा । 305 ई. पू. में चन्द्रगुप्त ने तत्कालीन यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया, जिसमें संधि के बाद सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त से 500 हाथी लेकर बदले में उसे अफगानिस्तान, बलूचिस्तान व सिंध के पश्चिमी क्षेत्रो को सौप दिया । सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया का विवाह चन्द्रगुप्त से कार दिया । मेगस्थनीज सेल्यूकस का राजदूत था जो चन्द्रगुप्त के दरबार में रहता था ।

चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर पश्चिम में ईरान (फारस) से लेकर पूर्व में बंगाल तक, उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में उत्तरी बंगाल(मैसूर) तक फैला हुआ था । चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण भारत की विजय के विषय में जानकारी तमिल ग्रन्थ अहनानुर एवं पुरनानुर तथा अशोक के अभिलेखों से मिलती है । इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य ने  एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया बिहार, बंगाल, उड़ीसा के अतिरिक्त पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत तथा दक्कन के क्षेत्र भी शामिल थे । चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायी था, अपने जीवन के अंतिम दिनों में चन्द्रगुप्त ने श्रवणबेलगोला (298 ई. पू.) में जैन विधि से उपासना पद्धति (सल्लेखना विधि) द्वारा प्राण त्याग दिए । जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मोर्य को सेंड्रोकोट्स कहा है, जबकि एरियन और प्लूटार्क ने चन्द्रगुप्त मौर्य को एन्ड्रोकोट्स कहा है ।

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बिन्दुसार

चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पुत्र बिन्दुसार 298 ई. पू. में मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा । बिन्दुसार को अमित्रघात (शत्रु विनाशक) के नाम से भी जाना जाता है । स्ट्राबो के अनुसार सीरियाई शासक एंटियोकस ने डायमेकस नामक अपना एक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा था । इसे ही मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है । जैन ग्रंथो में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है ।

सीरियाई शासक एंटियोकस से बिन्दुसार ने तीन वस्तुये मांगी थी – मदिरा, सूखे अंजीर तथा दार्शनिक । बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था । उसकी राज्यसभा में आजीवक सम्प्रदाय का एक ज्योतिषी निवास करता था । दक्षिणी भारत को संगठित करने का श्रेय बिन्दुसार को जाता है । उसके कार्यकाल में तक्षशिला में दो विद्रोह हुए, जिनका दमन के लिए उसने अपने पुत्री में से पहले सुसीम को और बाद में अशोक को भेजा ।

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अशोक

सिंहली अनुश्रुति (दीपवंश एवं महावंश) के अनुसार अशोक ने सत्ता प्राप्ति के लिए अपने 99 भाइयो की हत्या कर सिंहासन प्राप्त किया । लगभग चार वर्ष के सत्ता-संघर्ष के बाद अशोक का विधिवत राज्याभिषेक 269 ई. पू. में हुआ । राज्याभिषेक से पूर्व अशोक उज्जैन का राज्यपाल था । मास्की, गुर्जरा एवं निट्टूर अभिलेखों में उसका नाम अशोक, पुराणों में अशोकवर्धन, अन्य नाम देवानामप्रिय, प्रियदर्शी इत्यादि मिलता है ।

राज्याभिषेक के आठवे वर्ष 261 ई. पू. में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था और कलिंग की राजधानी तोसाली पर अधिकार कर लिया । कलिंग के हाथीगुम्फा अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय कलिंग पर नन्दराज नामक राजा शासन करता था । कलिंग युद्ध और उसके परिणामो के विषय में अशोक के तेरहवे शिलालेख से विस्तृत जानकारी मिलती है । कोटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार हाथियों के लिए प्रसिद्ध था और इन्ही हाथियों को प्राप्त करने के लिए अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था । अशोक के अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि उसका साम्राज्य उत्तर में अफगानिस्तान से दक्षिण में कर्नाटक तक तथा पश्चिम में काठियावाड़ से पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था ।

अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु को जाता है । अशोक ने सर्वप्रथम बोधगया की यात्रा की तथा अपने राज्याभिषेक के बीसवे वर्ष में वह लुम्बिनी गया । उसने लुम्बिनी को कर मुक्त घोषित किया तथा केवल 1/8 भाग कर के रूप में लेने की घोषणा की । अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेश एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा । अशोक के बौद्ध होने का सबसे सबल प्रमाण उसके भ्राबू शिलालेख (बैराठ राजस्थान) में मिलता है ।

जिसमे अशोक ने स्पष्तः बुद्ध, धम्म और संघ का उल्लेख किया है । बराबर की पहाडियों में अशोक ने आजीवको के निवास हेतु तीन गुफाओं कर्णचौपड़, सुदामा एवं विश्व झोपड़ी का निर्माण करवाया था । अशोक के अभिलेखों में चार लिपियों का प्रयोग हुआ है- ब्राह्मी, खारोश्ठी, यूनानी और अरामेइक । अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गये है । अशोक के अभिलेखों की सर्वप्रथम टीफेन्थेलर (1750) नामक पादरी ने की थी । उसने सबसे पहले दिल्ली मेरठ अभिलेख खोजा था । जेम्स प्रिन्सेप ने 1837 ई. में सर्वप्रथम ब्राह्मी लिपि को पदने में सफलता प्राप्त की थी । दो अभिलेख शाहबाजगढ़ी और मानसेहरा की लिपि खारोश्ठी है ।

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अशोक के शिलालेखो में वर्णित विषय-वस्त

शिलालेख विषय
पहला शिलालेख * पशुबलि की निंदा ।
* सभी मनुष्य मेरी संतान की तरह है ।
दूसरा शिलालेख* पशु चिकित्सा, मानव चिकित्सा एवं लोक-कल्याणकारी कार्य ।
* चोल, पाण्ड्य एवं चेर की चर्चा ।
तीसरा शिलालेख* राजकीय अधिकारियो को हार पाँचवे वर्ष दौरा करने का आदेश ।
चौथा शिलालेख * इसमें भेरिघोष की जगह धम्मघोष की घोषणा की गयी है ।
पाँचवा शिलालेख * धम्म महामत्रो की नियुक्ति के बारे में जानकारी।
* मौर्यकालीन समाज एवं वर्णव्यवस्था का उल्लेख ।
छठा शिलालेख * इसमें आत्मनियंत्रण की शिक्षा दी गयी है ।
सांतवा शिलालेख * सभी सम्प्रदायों के लिए सहिष्णुता की बात ।
आठवां शिलालेख * अशोक की तीर्थ यात्राओं का उल्लेख ।
* बोधगया के भ्रमण का उल्लेख ।
नवाँ शिलालेख * धम्म समारोह की चर्चा ।
* सच्ची भेंट व शिष्ठाचार का उल्लेख ।
दसवाँ शिलालेख * इसमें अशोक ने आदेश दिया है कि राजा तथा उच्च अधिकारी हमेशा प्रजा के हित में सोचे ।
ग्याहरवा शिलालेख * धम्म निति की व्याख्या ।
बाहरवा शिलालेख * इसमें स्त्री महामात्रो की नियुक्ति एवं सभी प्रकार के विचारो के सम्मान की बात कही गयी है ।
तेरहवा शिलालेख* कलिंग युद्ध का वर्णन एवं अशोक के ह्रदय परिवर्तन की बात कही गयी है ।
* पडोसी राजाओ का वर्णन ।
चौदहवा शिलालेख * अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया ।

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अशोक के स्तम्भ अभिलेखों की संख्या 7 है, जो केवल ब्राह्मी लिपि में लिखे गये है । यह 6 अलग अलग स्थानों से प्राप्त हुए है –

 

1 प्रयाग स्तम्भ लेख   –    यह पहले कौशाम्बी में स्थित था । इस स्तम्भ-लेख को अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित करवाया ।

2 दिल्ली टोपरा       –     यह स्तम्भ-लेख फिरोजशाह तुगलक के द्वारा टोपरा से दिल्ली लाया गया ।

3 दिल्ली मेरठ        –     पहले मेरठ में स्थित यह स्तम्भ-लेख फिरोजशाह द्वारा दिल्ली लाया गया ।

4 रामपुरवा           –     यह स्तम्भ-लेख चम्पारण (बिहार) में स्थापित है । इसकी खोज 1872 ई. में करलायल ने की थी ।

5 लौरिया अरेराज     –     यह भी चम्पारण (बिहार) में स्थित है ।

6 लौरिया नंदनगढ़    –     चम्पारण (बिहार) में इस स्तम्भ पर मोर का चित्र बना हुआ है ।

सम्राट की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद होती थी जिसमे सदस्यों की संख्या 12, 16 या 20 हुआ करती थी । अर्थशास्त्र में चर जासूस को कहा जाता था ।अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में प्रान्तों की संख्या 5 थी । प्रान्तों को चक्र कहा जाता था । प्रान्तों के प्रशासक कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे ।

प्रान्तों का विभाजन विषय में किया गया था, जो विषयपति के अधीन थे ।

प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका मुखिया ग्रामीक कहलाता था ।

अर्थशास्त्र में शीर्ष अधिकारी के रूप में “तीर्थ” का उल्लेख मिलता है, जिसे महामात्र भी कहा जाता था । इनकी संख्या 18 थी ।                      Maurya Empire

अर्थशास्त्र में वर्णित तीर्थ

मंत्रीप्रधानमंत्री
पुरोहित धर्म एवं दान विभाग का प्रधान
सेनापति सेन्य विभाग का प्रधान
युवराज राजपुत्र
दौवारिक राजकीय द्वार रक्षक
अन्तर्वेदिव अन्तः पुर का अध्यक्ष
समाहर्ता आय का संग्रहकर्ता
सन्निधाता राजकीय कोष का अध्यक्ष
प्रशास्ता कारागार का अध्यक्ष
प्रदेष्ट्री कमिश्नर
पौर नगर का कोतवाल
व्यावहारिक प्रमुख न्यायाधीश
नायक नगर रक्षा का अध्यक्ष
कर्मान्तिक उद्योगों व कारखानों का अध्यक्ष
मंत्रिपरिषद अध्यक्ष
दण्डपाल सेना का सामान एकत्र करने वाला
दुर्गपाल दुर्ग-रक्षक
अन्तपाल सीमावर्ती दुर्गो का रक्षक

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प्रशासको में सबसे छोटा गोप था, जो दस ग्रामो का शासन संभालता था ।बिक्री कर के रूप में मूल्य का 10 वां भाग वसूला जाता था, इसे बचाने वाले को मृत्युदण्ड दिया जाता था ।सेन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था । प्लिनी नामक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना में 6,00,000 पैदल सिपाही, 30,000 घुड़सवार व 9,000 हाथी थे ।मौर्य प्रशासन में गुप्तचर विभाग महामात्य सर्प नामक अमात्य के अधीन था । अर्थशास्त्र में गुप्तचर को गूढ-पुरुष कहा गया है तथा एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने वाले गुप्तचर को संस्था कहा जाता था । एक स्थान से दुसरे स्थान पर भ्रमण करके कार्य करने वाले गुप्तचर को संचार कहा जाता था ।

अशोक के समय जनपदीय न्यायालय के न्यायाधीश को रज्जुक कहा जाता था ।

सरकारी भूमि को सीताभूमि कहा जाता था ।

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मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है – 1  दार्शनिक,   2  किसान,   3  अहीर,  4   कारीगर,   5   सैनिक,  6   निरीक्षक  7  सभासद ।मौर्य शासन 137 वर्षो तक रहा । भागवत पुराण के अनुसार मौर्य वंश में दस राजा हुए जबकि वायुपुराण के अनुसार नौ राजा हुए ।मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहदत्त था । इसकी हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई. पू. में कर मगध पर शुंग वंश की नीव डाली ।

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