Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak Important Topic

 

Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak

गुप्त काल के प्रमुख शासक 

 

चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) 

  • चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का प्रथम प्रसिद्ध राजा एवं संस्थापक था।
  • इसने ही गुप्त वंश को एक साम्राज्य की प्रतिष्ठा प्रदान की। इसे इतिहास में एक नया सम्वत् (गुप्त सम्वत्) चलाने का श्रेय भी दिया जाता है।
  • गुप्त सम्वत् (319-20 ई.) तथा शक सम्वत् (78 ई.) के बीच 241 वर्षों का अन्तर था।
  • मुद्रा साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि चन्द्रगुप्त ने लिच्छिवी राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया था। इसने ‘स्मारक स्वर्ण मुद्रा’ जारी की थी, जिस पर कुमारदेवी नाम खुदवाया।

    स्वर्ण मुद्रा
    स्वर्ण मुद्रा
  • समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेख में इसे लिच्छिवि दौहित्र कहा गया है। Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak

समुद्रगुप्त (335-375 ई.)

  • चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। उसके समय में गुप्त साम्राज्य का सबसे अधिक विस्तार हुआ।
  • समुद्रगुप्त की सामरिक विजयों का विवरण हरिषेण के प्रशस्ति काव्य, प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है। इस प्रशस्ति में ही चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी चुने जाने का विवरण मिलता है।
  • समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के आर्यावर्त क्षेत्र के नौ शासकों को पराजित किया। पराजित राजाओं में अच्युत, नागसेन तथा गणपतिनाग प्रमुख थे। उसने उत्तर भारत के आर्यावर्त क्षेत्र पर प्रत्यक्ष शासन किया था।
  • उसने दक्षिणापथ के बारह शासकों को पराजित किया था। दक्षिणापथ नीति की तीन प्रमुख आधारशिलाएँ थीं

(I)ग्रहण शत्रु का अधिकार।

(II)मोक्ष शत्रु को मुक्त करना।            Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak

(III)अनुग्रह राज्य को लौटाकर शत्रु पर दया करना।

  • समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय को कालिदास ने ‘धर्मविजय‘ की संज्ञा प्रदान की है।
  • गणतन्त्रीय राज्यों ने सर्वकरदान, आज्ञाकरण और प्राणामागमन के द्वारा उसके प्रचण्ड शासन को परितुष्ट करने की चेष्टा की।
  • शक, कुषाण तथा मुरुण्ड आदि शासकों ने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते हए तीन विधियाँ अपनाईं।

(I) आत्मनिवेदन सम्राट के सामने स्वयं हाजिर होना।            Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak

(II) कन्योपायन अपनी पुत्रियों का गुप्त राजाओं से विवाह करना।

(III) गुरुत्मदंक स्वविषय-भुक्ति शासन याचना (अपने विषय या भुक्ति के लिए शासनादेश प्राप्त करना)।

  • समुद्रगुप्त का समकालीन लंकानरेश मेघवर्मन ने इसके पास उपहारों सहित एक दूत मण्डल भेजा था तथा गया में मठ बनाने की अनुमति माँगी थी।
  • अपनी विजयों के उपरान्त समुद्रगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ किया, जिसका परिचय उसके सिक्कों तथा उत्तराधिकारियों के अभिलेखों से प्राप्त होता है।
  • उसके सिक्कों पर मुद्रित अप्रतिरथ, व्याघ्रपराक्रमांक, पराक्रमांक जैसी उपाधियाँ उसके गौरवमय जीवन-चरित्र का स्पष्ट साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।                  Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak
  • ‘प्रयाग प्रशस्ति’ के अनुसार समुद्रगुप्त की दिग्विजय उददेश्य ‘धरणिबन्ध’ था। उसकी उत्तरी भारत (आर्यावर्त) में गई नीति को प्रसभोद्धरण तथा दक्षिणापथ में ग्रहण मोक्षानय गया है।
  • समुद्रगुप्त ने महान् बौद्ध भिक्षु वसुबन्धु को संरक्षण दिया था।
  • उसने गुप्तों के राजचिह्न गरुड़ छाप वाली ताम्र मुद्राएँ चलाईं।

चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-412 ई.)

Chandragupta second
Chandragupta second                              Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak
  • गुप्तवंशावली में समुद्रगुप्त के पश्चात् चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम उल्लिखित है परन्तु दोनों शासकों के बीच रामगुप्त नामक एक दर्बल शासक के अस्तित्व का भी पता चलता है। इसे इतिहास में काच के नाम से जाना जाता है।
  • विशाखदत्त कृत देवीचन्द्रगुप्त नामक नाटक में भी चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य से पूर्व रामगुप्त का गुप्त शासक के रूप में वर्णन किया गया है।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने उत्कर्ष की चोटी पर पहुँचा। उसने वैवाहिक सम्बन्ध और विजय दोनों तरह से साम्राज्य की सीमा का विस्तार किया।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देवगुप्त, देवराज, देवश्री तथा उपाधियाँ विक्रमांक, विक्रमादित्य, परमभागवत आदि थीं।                            Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक मुद्राओं के ही अनुकरण पर चाँदी के सिक्के उत्कीर्ण करवाए। पश्चिमी शक विजय के फलस्वरूप ही उसने व्याघ्र सिक्के उत्कीर्ण कराए तथा विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। भारतीय अनुश्रुतियों में उसे शकारि के रूप में जाना गया है। शकों पर विजय के बाद उसने चाँदी की मुद्राएँ चलाई और उज्जयिनी को द्वितीय राजधानी बनाया था।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय की दिग्विजयों का उल्लेख उसके उदयगिरि गुहालेख से होता है।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में पाटलिपुत्र एवं उज्जयिनी विद्या के प्रमुख केन्द्र थे।
  • उसके शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान (399-414 ई.) भारत आया था। उसने अपने यात्रा वृत्तान्त में मध्य देश को ब्राह्मणों का देश कहा है।
  • पाटलिपुत्र से ही फाह्यान ने वापसी यात्रा आरम्भ की। अपनी पूरी यात्रा विवरण में वह कहीं भी सम्राट का नामोल्लेख नहीं करता।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल ब्राह्मण धर्म के चरमोत्कर्ष का काल था। इसने अश्वमेघ यज्ञ किया था।
  • उसका प्रधान सचिव वीरसेन तथा प्रधान सेनापति आम्रकार्दव था. जिसका उल्लेख उदयगिरि अभिलेख में मिलता है।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन का स्मरण लड़ाइयों के कारण नहीं, बल्कि कला और साहित्य के प्रति उसके अगाध अनुराग के कारण करते हैं।                Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak
  • अनुश्रुतियों के अनुसार उसके दरबार में नौ विद्वानों की एक मण्डली निवास करती थी जिसे नवरत्न कहा गया है। इनमें कालिदास, धनवन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु वेताल भट्ट, घटकर्पर, वराहमिहिर, वररुचि जैसे विद्वान् थे।

कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (415-454 ई.) 

  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के उपरान्त कुमारगुप्त प्रथम शासक बना। परन्तु कुमारगुप्त के पूर्व एक और शासक का नाम आता है। वह शासक ध्रुवदेवी (रामगुप्त की पत्नी) का पुत्र गोविन्द गुप्त था। इतिहासकारों में मतभेदों के कारण यह एक विवादास्पद विषय है।
  • कुमारगुप्त के शासन की प्रथम तिथि (415 ई.) उसके बिलसद अभिलेख से ज्ञात होती है तथा अन्तिम तिथि का अनुमान उसके चाँदी के सिक्कों से मिलता है।
  • बिलसद अभिलेख से ही कुमार गुप्त तक गुप्तों की वंशावली प्राप्त होती है।
  • कुमारगुप्त के सुव्यवस्थित शासन का वर्णन उसके मन्दसौर अभिलेख से मिलता है। यह अभिलेख एक प्रशस्ति के रूप में है जिसकी रचना वत्सभट्टि ने की थी।
  • गुप्त शासकों में कुमारगुप्त के सर्वाधिक अभिलेख मिलते हैं।
  • मध्य-भारत में रजत सिक्कों का प्रचलन उसी के काल में हुआ। इन मुद्राओं पर गरुड़ के स्थान पर मयूर की आकृति उत्कीर्ण की गई है। इन सिक्कों पर गुदी आकृतियों से पता चलता है कि उसने अश्वमेघ यज्ञ किया था।
  • इसके शासनकाल में द्वितीय जैन संगीति का आयोजन किया गया।
  • इसके शासनकाल की मुख्य घटना हूणों का आक्रमण था।

स्कन्दगुप्त (544-467 ई.)

  • कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद स्कन्दगुप्त शासक बना। उसके शासन की बागडोर सम्भालते ही हूणों का आक्रमण हुआ।
  • म्लेच्छों (हूणों) पर स्कन्दगुप्त की सफलता का गुणगान जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है। चन्द्रगर्भ परिपृच्छ नामक ग्रन्थ में भी महेन्द्रसेन (कुमारगुप्त प्रथम) के पुत्र द्वारा विदेशियों पर विजय प्राप्त करने का साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध है।            Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak
  • स्कन्दगुप्त ने सुदर्शन झील के पुनरुद्धार का कार्य सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौंपा था। उसने झील के किनारे एक विष्णु मन्दिर का निर्माण भी करवाया था।
  • स्कन्दगुप्त को कहोम स्तम्भ लेख में ‘शक्रादित्य’ आर्यमंजुश्री मुलकल्प में देवराय तथा जनागढ़ अभिलेख में ‘श्री परिक्षिप्तवक्षा’ कहा गया है।
  • ह्वेनसांग ने नालन्दा संघाराम को बनवाने वाले शासकों में शक्रादित्य के नाम का उल्लेख किया है, जिससे स्कन्दगुप्त द्वारा नालन्दा संघाराम को सहायता देने का प्रमाण मिलता है।
  • स्कन्दगुप्त ने 466 ई. में चीनी सांग सम्राट के दरबार में राजदूत भेजे थे। उससे उसके सुदूर चीन के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का पता चलता है।
  • प्रशासनिक सुविधा के लिए स्कन्दगुप्त ने अपनी राजधानी को अयोध्या स्थानान्तरित किया।
  • इसने नन्दी प्रकार की मुद्रा का प्रचलन किया।
  • स्कन्दगुप्त के बाद 8 उत्तराधिकारी हुए। इनमें से बुद्धगुप्त सर्वाधिक शक्तिशाली था।
  • उत्तराधिकारियों में भानुगुप्त का एरण अभिलेख (510 ई.)प्रसिद्ध है। यह सती-प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य उपलब्ध कराता है।                              Gupt Kaal Ke Pramukh Shasak
  • विष्णुगुप्त तृतीय गुप्त साम्राज्य का अन्तिम शासक था।

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